व्यक्ति यह नहीं कह सकता कि विजय पास है या दूर ─ व्यक्ति को पास और दूरकी चिन्ता किये बिना लक्ष्य पर दृढ़ रहकर साधना की क्रिया करते हुए स्थिरतापूर्वक आगे बढ़ते जाना होगा और यदि यह पास आता प्रतीत होता हो तो हर्षित नहीं होना चाहिये, यदि अभी दूर प्रतीत होता हो तो उदास भी नहीं हो जाना चाहिये।
सन्दर्भ : श्रीअरविन्द के पत्र (भाग – ३)
मां, क्या खेल-प्रतियोगिताएं हमारी प्रगति के लिये आवश्यक है? नैतिक शिक्षाकी दृष्टिसे वे काफी हद…
आध्यात्मिक भाव पूजा, भक्ति और निवेदन के धार्मिक भाव के विपरीत नहीं है, धर्म में…
तू ही मेरे जीवनका एकमात्र लक्ष्य, मेरी अभीप्सा का केंद्र, मेरे चिंतन की धुरी, मेरे…
हर व्यक्ति अपने स्वभाव के अनुसार कार्य करता है और अगर वह साहस के साथ,…