समभाव


श्रीअरविंद अपने कक्ष में

व्यक्ति यह नहीं कह सकता कि विजय पास है या दूर ─ व्यक्ति को पास और दूरकी चिन्ता किये बिना लक्ष्य पर दृढ़ रहकर साधना की क्रिया करते हुए स्थिरतापूर्वक आगे बढ़ते जाना होगा और यदि यह पास आता प्रतीत होता हो तो हर्षित नहीं होना चाहिये, यदि अभी दूर प्रतीत होता हो तो उदास भी नहीं हो जाना चाहिये।

सन्दर्भ : श्रीअरविन्द के पत्र (भाग – ३)


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