सत्य ‘शक्ति’ हमेशा अचंचल होती है । दुर्बलता और अपूर्णता के निश्चित लक्षण हैं – बेचैनी, उत्तेजना तथा अधीरता।
तुम्हें बाहरी परिस्थितियों में अचंचलता की खोज न करनी चाहिये, वह तुम्हारें अपने अन्दर है । सत्ता की गहराइयों के अन्दर एक ऐसी शांति है जो समस्त सत्ता में , शरीर तक में अचंचलता लाती है – अगर तुम उसे लाने दो ।
तुम्हें उस शांति की खोज करनी चाहिये और तब तुम्हें वह अचंचलता मिल जायेगी जिसकी तुम्हें चाह है ।
संदर्भ : माताजी के वचन (भाग -२)
(अधिकतर साधक) अहंकारी होते हैं और वे अपने अहंभाव को अनुभव या स्वीकार नहीं करते।…
अवतार की सम्भावना पर विश्वास करने या न करने से प्रकट तथ्य पर कोई फ़र्क़…
यदि चैत्य पुरुष की प्रकृति जाग्रत हो जाए, अपने पीछे विद्यमान माताजी की चेतना और…
भागवत चेतना की विभिन्न अवस्थाएँ होती हैं। रूपांतर की भी विभिन्न अवस्थाएँ होती है। पहली…