सत्य ‘शक्ति’ हमेशा अचंचल होती है । दुर्बलता और अपूर्णता के निश्चित लक्षण हैं – बेचैनी, उत्तेजना तथा अधीरता।
तुम्हें बाहरी परिस्थितियों में अचंचलता की खोज न करनी चाहिये, वह तुम्हारें अपने अन्दर है । सत्ता की गहराइयों के अन्दर एक ऐसी शांति है जो समस्त सत्ता में , शरीर तक में अचंचलता लाती है – अगर तुम उसे लाने दो ।
तुम्हें उस शांति की खोज करनी चाहिये और तब तुम्हें वह अचंचलता मिल जायेगी जिसकी तुम्हें चाह है ।
संदर्भ : माताजी के वचन (भाग -२)
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