सत्य ‘शक्ति’ हमेशा अचंचल होती है । दुर्बलता और अपूर्णता के निश्चित लक्षण हैं – बेचैनी, उत्तेजना तथा अधीरता।
तुम्हें बाहरी परिस्थितियों में अचंचलता की खोज न करनी चाहिये, वह तुम्हारें अपने अन्दर है । सत्ता की गहराइयों के अन्दर एक ऐसी शांति है जो समस्त सत्ता में , शरीर तक में अचंचलता लाती है – अगर तुम उसे लाने दो ।
तुम्हें उस शांति की खोज करनी चाहिये और तब तुम्हें वह अचंचलता मिल जायेगी जिसकी तुम्हें चाह है ।
संदर्भ : माताजी के वचन (भाग -२)
उनके दुःख-दर्द से तीव्र रूप से पीड़ित होकर मैं तेरी ओर मुड़ी और उसका उपचार…
भागवत शक्ति को ग्रहण करने की क्षमता प्राप्त करने तथा तुम्हारे माध्यम से बाह्य जीवन…
यह कभी न भूलो कि तुम अकेले नहीं हो । भगवान् तुम्हारे साथ हैं, तुम्हारी…
जहाँ कहीं तुम एक महान अंत देखो, निश्चित हो जाओ कि एक महान आरंभ हो…
हमें यादों से इतना स्नेह होता है क्योंकि वे सार्वभौमिक हैं। उनके अन्दर 'अनन्तता' के…