अगर तुम किसी सच्चे वैज्ञानिक से मिलो जिसने कठोर परिश्रम किया हो, तो वह तुमसे कहेगा : “हम कुछ नहीं जानते। हम कल जो जानेंगे उसकी तुलना में आज जो जानते हैं वह कुछ भी नहीं है। इस वर्ष को खोजें अगले वर्ष पीछे छूट जायेंगी।” सच्चे वैज्ञानिक को मालूम है कि वह जितनी चीजें जानता है उनको अपेक्षा वे चीजें बहुत ज्यादा है जिन्हें वह नहीं जानता। और यह बात मानव क्रिया-कलाप की सभी शाखाओं के बारे में सच्ची है। मैंने किसी भी सम्माननीय वैज्ञानिक को घमण्डी नहीं देखा। मैंने कभी ऐसा व्यक्ति नहीं देखा, जिसका कुछ मूल्य हो, जो कहता हो : “मैं सब कुछ जानता हूं।” मैंने जिन लोगों को देखा है उन्होंने हमेशा स्वीकार किया है : “संक्षेप में, मैं कुछ नहीं जानता।” उसने जो कुछ किया है, उसे जो कुछ मिला है उस सबको चर्चा करने के बाद बह शान्ति से कहता है : “आखिर, में कुछ नहीं जानता।”
संदर्भ : प्रश्न और उत्तर १९५३
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