स्वयं को ब्रह्मांड की अंतिम सीमाओं और उससे भी आगे तक फैला दो।
स्वयं के ऊपर ले लो विकास की सारी अवश्यकताएँ और उन्हें एकत्व के तीव्र आनंद में गला दो। और तब तुम दिव्यत्व ही हो जाओगें।
संदर्भ : श्रीमाँ का एजेंडा (भाग-१)
व्यापक दृष्टि से विचार करने पर मुझे ऐसा लगता है कि प्रचार करने योग्य सबसे…
तुम पानी में गिर पड़ते हो। वह विपुल जलराशि तुम्हें भयभीत नहीं करती। तुम हाथ-पांव…
अंदर की बेचैनी ही तुम्हें आंतरिक और बाह्य रूप से नींद लेने से रोकती है।…
तुम्हें डरना नहीं चाहिये। तुम्हारी अधिकतर कठिनाइयां भय से आती है। वास्तव में, ९० प्रतिशत…