स्वयं को ब्रह्मांड की अंतिम सीमाओं और उससे भी आगे तक फैला दो।
स्वयं के ऊपर ले लो विकास की सारी अवश्यकताएँ और उन्हें एकत्व के तीव्र आनंद में गला दो। और तब तुम दिव्यत्व ही हो जाओगें।
संदर्भ : श्रीमाँ का एजेंडा (भाग-१)
जीवनयात्रा में समस्त भय, संकट और विपदा का सामना करने के लिए कवच के रूप…
अपने तुच्छ, स्वार्थपूर्ण व्यक्तित्व से बाहर निकलो ओर अपनी भारतमाता के योग्य शिशु बनो ।…
सारी समस्या का निचोड़ यह है : बुद्धि के मानसिक प्रशासन की जगह आध्यात्मिक चेतना…