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सच्ची धार्मिक भावना

. . . बहुत कम लोग हैं, बहुत ही कम, उनकी संख्या न के बराबर है, जो सच्ची धार्मिक भावना के साथ गिरजाघर या मंदिर जाते हैं, यानी, किसी चीज़ के लिए प्रार्थना करने या भगवान से कुछ माँगने के लिए नहीं, बल्कि अपने – आपको अर्पित करने के लिए, कृतज्ञता प्रकट करने के लिए, अभीप्सा और आत्म-समर्पण करने के लिए जाते हैं। मुश्किल से लाखों में एक ऐसा होता है । . . . केवल इतना ज़रूर है कि तुम बड़ी सद्भावना के साथ जाते हो इसलिए तुम कहते हो : “ओह ! ध्यान के लिए कितनी शांत जगह है यह !”

संदर्भ : प्रश्न और उत्तर १९५३ 

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