संकुचित अनुभव की एक संकीर्ण झालर सम इस जीवन को
जो हमारी बांट में आया है, पीछे छोड़ देते हैं,
अपने लघु विहारों को, अपनी अपर्याप्त पहुंचों को तज देते हैं,
हमारी जीव-सत्ताएं इन महत्त्वपूर्ण एकाकी घड़ियों में
अविनाशी दिव्य-ज्योति के शान्त क्षेत्रों में रमण कर सकती हैं,
नीरव परा-शक्ति के गरुड़ाचारी सर्वद्रष्टा शिखरों पर
और अगाध परमानन्द के तीव्र शशि शीतल-ज्वाल सागरों पर
और आत्माकाश की प्रशान्त विशालताओं में रम सकती हैं।

संदर्भ : “सावित्री”

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