योग का लक्ष्य श्रीअरविन्द या श्रीमाताजीके ‘जैसा’ बनना नहीं है। जो लोग इस विचार का पोषण करते हैं बड़ी आसानी से आगे के इस विचार पर पहुँच जाते हैं कि वे उनके बराबर और यहां तक कि उनसे अधिक बड़े बन सकते हैं। यह केवल अपने अहंका पोषण करना है ।
संदर्भ : श्रीअरविंद के पत्र (भाग – २)
एक या दो बार, बस खेल-ही-खेलमें आपने अपनी या श्रीअरविंदकी कोई पुस्तक ली और सहसा…
मेरे प्यारे बालक, तुम हमेशा मेरी भुजाओं में रहते हो और मैं तुम्हें सुख-सुविधा देने,…