जब एक बार चेतनाएं एकाकी चेतना से पृथक् हो गयीं तब अवश्यम्भावी रूप से वे अज्ञान में गिर गयीं, और अज्ञान की अन्तिम परिणति निश्चेतना थी; एक अन्धकारमय असीम निश्चेतना से यह भौतिक जगत् उदित होता है और इसमें से प्रकट होती आत्मा क्रमविकास के द्वारा छिपी हई ज्योति से आकृष्ट होकर चेतना में संघर्ष करती हुई उस लुप्त दिव्यता की ओर, जहां से यह आयी है, अब तक अन्धे के समान आरोहण कर रही है।
संदर्भ : श्रीअरविंद के पत्र
अंदर की बेचैनी ही तुम्हें आंतरिक और बाह्य रूप से नींद लेने से रोकती है।…
तुम्हें डरना नहीं चाहिये। तुम्हारी अधिकतर कठिनाइयां भय से आती है। वास्तव में, ९० प्रतिशत…
श्रीअरविंद ने कितनी ही बार इस बात को दोहराया है कि परमात्मा हास्यप्रिय हैं और…
अभीप्सा का तात्पर्य है, शक्तियों को पुकारना । जब शक्तियाँ प्रत्युत्तर दे देती हैं, तब…