श्रीमाताजी सभी साधकों के चारों ओर अपना संरक्षण रखती हैं, परंतु वे यदि अपने ही कर्म या मनोभाव के कारण उस संरक्षण के घेरेसे बाहर चले जायं तो उसके अवांछनीय परिणाम उत्पन्न हो सकते हैं।

सन्दर्भ : श्रीअरविन्द के पत्र (भाग-२)

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