परम प्रभु के लिये पाप का अस्तित्व ही नहीं है – सभी दोष सच्ची अभिप्सा और रूपांतर द्वारा मिटाए जा सकते हैं।
तुम जिस चीज़ का अनुभव करते हो वह तुम्हारी आत्मा की अभीप्सा है जो भगवान को जानना और उनमें जीना चाहती है ।
धैर्य धरो, ज़्यादा से ज़्यादा निष्कपट बनो और तुम्हारी विजय होगी।
संदर्भ : माताजी के वचन (भाग-२)
अंदर की बेचैनी ही तुम्हें आंतरिक और बाह्य रूप से नींद लेने से रोकती है।…
तुम्हें डरना नहीं चाहिये। तुम्हारी अधिकतर कठिनाइयां भय से आती है। वास्तव में, ९० प्रतिशत…
श्रीअरविंद ने कितनी ही बार इस बात को दोहराया है कि परमात्मा हास्यप्रिय हैं और…
अभीप्सा का तात्पर्य है, शक्तियों को पुकारना । जब शक्तियाँ प्रत्युत्तर दे देती हैं, तब…