‘परम प्रभु’ के लिए पाप का अस्तित्व ही नहीं है – सभी त्रुटियां और दोष सच्ची अभीप्सा और रूपान्तर द्वारा मिटाये जा सकते हैं ।
तुम जो अनुभव कर रहे हो वह तुम्हारी अन्तरात्मा की अभीप्सा है जो भगवान् को खोजना और ‘उन्हें’ जीना चाहती है ।
धैर्य धरो , ज्यादा से ज्यादा निष्कपट बनो और तुम्हारी विजय होगी ।
संदर्भ : माताजी के वचन ( भाग- २)
उनके दुःख-दर्द से तीव्र रूप से पीड़ित होकर मैं तेरी ओर मुड़ी और उसका उपचार…
भागवत शक्ति को ग्रहण करने की क्षमता प्राप्त करने तथा तुम्हारे माध्यम से बाह्य जीवन…
यह कभी न भूलो कि तुम अकेले नहीं हो । भगवान् तुम्हारे साथ हैं, तुम्हारी…
जहाँ कहीं तुम एक महान अंत देखो, निश्चित हो जाओ कि एक महान आरंभ हो…
हमें यादों से इतना स्नेह होता है क्योंकि वे सार्वभौमिक हैं। उनके अन्दर 'अनन्तता' के…