पहली चीज़ है अपने-आपको विचार, भाव और क्रिया में विश्व के केंद्र में न रखना, मानों उसका अस्तित्व तुम्हारे लिए ही है – तुम विश्व के एक भाग हो। तुम उसके साथ एक हो सकते हो, परंतु एकमात्र परम प्रभु ही केंद्र हैं क्योंकि वे सबका अतिक्रमण करते और उन्हें समाये हुए हैं ।
संदर्भ : श्रीमातृवाणी (खंड-१६)
उनके दुःख-दर्द से तीव्र रूप से पीड़ित होकर मैं तेरी ओर मुड़ी और उसका उपचार…
भागवत शक्ति को ग्रहण करने की क्षमता प्राप्त करने तथा तुम्हारे माध्यम से बाह्य जीवन…
यह कभी न भूलो कि तुम अकेले नहीं हो । भगवान् तुम्हारे साथ हैं, तुम्हारी…
जहाँ कहीं तुम एक महान अंत देखो, निश्चित हो जाओ कि एक महान आरंभ हो…
हमें यादों से इतना स्नेह होता है क्योंकि वे सार्वभौमिक हैं। उनके अन्दर 'अनन्तता' के…