लोग अपनी नियति के बारे में रोते-धोते रहते हैं और अनुभव करते हैं कि अगर अन्य लोग और चीजें बदल जायें तो उनकी कठिनाइयां और दुःखद प्रतिक्रियाएं दूर हो जायेंगी। क्या आप इस अनुभव के प्रति मेरी शंका से सहमत हैं?
हर एक अपने-आप अपने दुःखों का शिल्पी होता है।
सन्दर्भ : माताजी के वचन (भाग-२)
... जब तुम्हें लगे कि तुम पूरी तरह किसी सँकरे, सीमित विचार, इच्छा और चेतना…
उदार हृदय हमेशा पुराने दुर्व्यवहारों को भूल जाता है और दुबारा सामंजस्य लाने के लिए…
बच्चे को कभी डाँटना-फटकारना नहीं चाहिये। माता-पिताओं की बुराई करने के लिए मुझे दोष दिया…
शायद तुम्हें बताया गया होगा कि शरीर की कुछ विशेष व्याधियों से तुम्हें बहुत दर्द…
मेरी प्यारी माँ, काश ! मैं अपनी अज्ञानी सत्ता को यह विश्वास दिला पाता कि…