दिव्य दृष्टि – (सॉनेट) – श्रीअरविंद की कविता

तेरे आनन्द से अब हर दृष्टि है अमर :
मेरी आत्मा सम्मोहित नयनों से करने आयी है दर्शनः
फट गया एक आवरण और अब वे नहीं चूक सकते
तेरे विश्व-प्राकट्य का चमत्करण।

अन्तर-दर्शन के आनन्द में गृहीत
हर नैसर्गिक पदार्थ है तेरा ही एक अंश,
एक प्रहर्ष-प्रतीक तेरे सार से संस्कारित,
एक कविता सौन्दर्य के जीवन्त हृदय में आकृत,

रंग और रूपांकन की एक उत्कृष्ट कलाकृति,
विभव के पंखों पर समारूढ़ एक महत् माधुर्यः ।
अत्यन्त अवर वस्तुओं में भी स्वयं को करता उद्घाटित
अर्थपूर्ण सरणी का एक भारग्रस्त आश्चर्य।

सारे रूप हैं हर्ष की तेरी स्वप्न-बोलियों के प्रकार,
ओ परम पूर्ण, ओ अनन्त विशदाकार।

अनुवाद : अमृता 

 

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