हे प्रभो, इस सत्ता में कोई चीज तुझसे कहती है :
“मैं कुछ नहीं जानती,
“मैं कुछ नहीं हूं,
“मैं कुछ नहीं कर सकती,
“मैं निश्चेतना के अंधेरे में हूं।”
और कोई और चीज है जो जानती है कि वह स्वयं ‘तू’ है और इस तरह परम पूर्णता है। इसमें से क्या परिणाम निकलने वाला है? ऐसी अवस्था का अन्त कैसे आयेगा? यह जड़ता है या सच्चा धैर्य, यह मुझे
नहीं मालूम; लेकिन बिना जल्दबाजी और बिना कामना के मैं तेरे चरणों में नत हूं और प्रतीक्षा कर रही हूं।
संदर्भ : प्रार्थना और ध्यान
अप्रिय विचार अप्रिय भावनाएं लाते हैं--अप्रिय भावनाएं तुम्हें भगवान् से दूर ले जाती हैं और…
भूल या सजा देने का कोई प्रश्न ही नहीं है-अगर लोगों को हम उनकी भूलों…
इन छोटी-छोटी बातों से क्यों उत्तेजित हो जाते हो? या उनसे अपने को क्यों विचलित…
जो श्रद्धा वैश्व भगवान के प्रति जाती है वह लीला की आवश्यकताओं के कारण अपनी…
भगवान मुझसे क्या चाहते है ? वे चाहते है कि पहले तुम अपने-आपको पा लो,…