… मैं सभी वस्तुओं में प्रवेश करती हूँ, प्रत्येक परमाणु के हृदय में निवास करते हुए मैं वहाँ उस अग्नि को उद्बुद्ध करती हूँ जो शुद्ध करती और रूपांतरित करती है ,यह एक ऐसी अग्नि है जो कभी नहीं बुझती, जो तेरे परमआनंद की संदेशवाहक ज्वाला है , समस्त पूर्णताओं की सिद्धिदाता है ।
तब यही प्रेम नीरवता के साथ ध्यानशील बन जाता है और हे अज्ञेय भव्यता, वह तेरी ओर मुड़ कर आनंद में ‘तेरी नयी अभिव्यक्ति’ की प्रतीक्षा में हैं …
संदर्भ : प्रार्थना और ध्यान
जीवनयात्रा में समस्त भय, संकट और विपदा का सामना करने के लिए कवच के रूप…
अपने तुच्छ, स्वार्थपूर्ण व्यक्तित्व से बाहर निकलो ओर अपनी भारतमाता के योग्य शिशु बनो ।…
सारी समस्या का निचोड़ यह है : बुद्धि के मानसिक प्रशासन की जगह आध्यात्मिक चेतना…