एक तरु रेतीले सर-तीर
बढ़ाये अपने लंबे डाल
अंगुलियों से ऊपर की ओर
चाहता छूना गगन विशाल ।
किन्तु पायेंगे क्या वे स्वर्ग
प्रणय-रस जिनका भू में मूल,
विश्व-सुषमाओं पर हम मुग्ध
सकेंगे कैसे इनको भूल।
सखे! यह मानव-आत्मा दिव्य
गात और मानस जिनको, शोक !
लुभाती जगती-छवि, मेरे
रहे स्वर्गिक विचार को रोक ।
संदर्भ : श्रीअरविंद की कविता ‘A Tree’ का अनुवाद
मैं तुम्हें अपना पुराना मन्त्र बताती हूं; यह बाह्य सत्ता को बहुत शान्त रखता है…
अगर अपात्रता का भाव तुम्हें उमड़ती हुई कृतज्ञता से भर देता है और आनन्दातिरेक के…
कभी मत बुड़बुड़ाओ । जब तुम बुड्बुड़ाते हो तो तुम्हारे अन्दर सब तरह की शक्तियां…