तुम जिस चरित्र-दोष की बात कहते हो वह सर्वसामान्य है और मानव प्रकृति में प्रायः सर्वत्र पाया जाता है। असत्य बात कहने का अथवा कम-
से-कम किसी वस्तु को अतिरञ्जित करने या उसका महत्त्व कम करने का अथवा सत्य को इस रूप में तोड़ने-मरोड़ने का आवेग सभी में पाया जाता
है जिससे व्यक्ति अपने गर्व को, पसन्दगियों और इच्छाओं को तृप्त करे अथवा कोई लाभ उठाये या कोई अभीष्ट वस्तु प्राप्त कर ले। यदि व्यक्ति
को सचमुच ही अपनी प्रकृति को बदलने में सफल होना हो तो उसे केवल सत्य बोलना ही सीखना होगा।।
प्रकृति में जो चीज बदलनी है उसके विषय में सचेतन होना उसे बदलने की ओर पहला कदम है। परन्तु मनुष्य को हताश हुए बिना या यह
सोचे बिना इन चीजों का निरीक्षण करना चाहिये कि “यह निराशाजनक स्थिति है” या “मैं इसे बदल नहीं सकता”। तुम्हारा यह विश्वास करना
बिलकुल ठीक है कि परिवर्तन अवश्य होगा, क्योंकि अगर चैत्य पुरुष जाग्रत् हो और अपने पीछे विद्यमान और तुम्हारे अन्दर कार्य करने वाली
माताजी की चेतना और शक्ति के द्वारा पथ-प्रदर्शन करता हो तो प्रकृति में कुछ भी करना असम्भव नहीं। इस समय यही हो रहा है। दृढ़ विश्वास
रखो कि सब कुछ सम्पन्न हो जायेगा।
संदर्भ : श्रीअरविन्द के पत्र (भाग-३)
उनके दुःख-दर्द से तीव्र रूप से पीड़ित होकर मैं तेरी ओर मुड़ी और उसका उपचार…
भागवत शक्ति को ग्रहण करने की क्षमता प्राप्त करने तथा तुम्हारे माध्यम से बाह्य जीवन…
यह कभी न भूलो कि तुम अकेले नहीं हो । भगवान् तुम्हारे साथ हैं, तुम्हारी…
जहाँ कहीं तुम एक महान अंत देखो, निश्चित हो जाओ कि एक महान आरंभ हो…
हमें यादों से इतना स्नेह होता है क्योंकि वे सार्वभौमिक हैं। उनके अन्दर 'अनन्तता' के…