इस समर्पण-मार्ग को यदि तुम पूर्ण रूप से और सच्चाई के साथ अपना लो तो कोई गंभीर कठिनाई या कोई खतरा नहीं रहता। प्रश्न केवल सच्चाई का है । यदि तुम सच्चे नहीं हो तो योग-साधना आरम्भ मत करो । मानवीय विषयों में धोखा-धाड़ी चल सकती है, किन्तु भगवान के साथ व्यवहार करने में धोखे के लिए कोई स्थान नहीं हैं। तुम इस मार्ग पर तभी निरापद होकर यात्रा कर सकते हो जब तुम ऋजु, निष्कपट तथा रोम-रोम तक में खुले हुये हो, जब तुम्हारा एकमात्र ध्येय भगवान का साक्षात्कार करना, उन्हें पाना और उनके द्वारा परिचालित होना हो ।

संदर्भ : प्रश्न और उत्तर (१९२९-१९३१)

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