सामान्यतः जो चला गया या चली गयी है, जाने के बाद उसके शरीर का कुछ भी हो, उसकी चेतना को कोई कष्ट नहीं पहुंचता । लेकिन स्वयं जड़-भौतिक शरीर में एक चेतना है जिसे “आकार या रूप की आत्मा” कहते हैं और उसे एकत्रित कोषाणुओं से पूरी तरह बाहर निकालने में समय लगता है ; सारे शरीर में सड़ांध का शुरू होना उसके चले जाने के बाद पहला चिन्ह है , और जाने से पहले शरीर में जो कुछ हो रहा है उसके बारे में उसे एक तरह का अनुभव हो सकता है। इसलिए हमेशा यह ज्यादा अच्छा होता है कि अन्त्येष्टि में जल्दबाज़ी न की जाये।
श्रीअरविन्द सूक्ष्म-भौतिक में निरन्तर रहते हैं और वहां बहुत सक्रिय हैं। मैं प्रायः रोज उनसे…
हे माँ , मैं आपकी उपस्थिति का अनुभव क्यों नहीं करता ? मानसिक गतिविधि की…
कोई संस्था प्रगतिशील हुए बिना जीवित नहीं रह सकती। सच्ची प्रगति है हमेशा भगवान् के…