कठिनाइयाँ और विपत्तियाँ

श्रीमाँ ने अपनी एक सहायिका से कहा था, “बहुत से लोग जब यहाँ आते है तब जो वस्तु उन्हें अशांत करती है, उन्हें उसी का सामना करना पड़ता है; अगर वे यह तथ्य समझ जाये तो प्रगति करने में यह उनकी बहुत सहायता करता है।” उदाहरणस्वरूप श्रीमाँ ने एक साधक का उल्लेख किया, जो शाकाहारी और जैन मतावलम्बी था और एक बौद्ध मठ में रह चुका था। आश्रम आने पर उसे रहने के लिए जो कमरा दिया गया वहाँ पास में ही मुर्गियाँ कटती थीं। किन्तु इस साधक ने यह समझ लिया कि उसको अपनी वितृष्णा पर विजय पानी होगी। श्रीमाँ ने कहा, “जब लोग वस्तुओं को इस दृष्टि से देख सकते हैं और उन्हें शांति से स्वीकार करते हैं, तब यह बहुत मूल्यवान होता है । ”

संदर्भ : श्रीअरविंद और श्रीमाँ की दिव्य लीला 

शेयर कीजिये

नए आलेख

प्रभो, वर दे!

उनके दुःख-दर्द से तीव्र रूप से पीड़ित होकर मैं तेरी ओर मुड़ी और उसका उपचार…

% दिन पहले

तीन शर्तें

भागवत शक्ति को ग्रहण करने की क्षमता प्राप्त करने तथा तुम्हारे माध्यम से बाह्य जीवन…

% दिन पहले

भगवान तुम्हारे साथ हैं

यह कभी न भूलो कि तुम अकेले नहीं हो । भगवान् तुम्हारे साथ हैं, तुम्हारी…

% दिन पहले

चिंता

चिंता करना जहर का प्याला पीने के समान है । संदर्भ : पथ पर 

% दिन पहले

महान अंत ? या महान आरंभ?

जहाँ कहीं तुम एक महान अंत देखो, निश्चित हो जाओ कि एक महान आरंभ हो…

% दिन पहले

यादें

हमें यादों से इतना स्नेह होता है क्योंकि वे सार्वभौमिक हैं। उनके अन्दर 'अनन्तता' के…

% दिन पहले