मैं तुम सबमें द्वार खोलने के लिए पूरा ध्यान देती हूँ, ताकि अगर तुम्हारें अंदर एकाग्रता की जरा भी गति हो, तो तुम्हें ऐसे बंद दरवाजे के सामने लंबी अवधियों तक न ठहरना पड़ें जो हिलता तक नहीं, जिसकी चाबी तुम्हारें पास नहीं है और जिसे तुम खोलना नहीं जानते।
दरवाजा खुला हुआ है, तुम्हें उस दिशा में देखना-भर होगा। तुम्हें उसकी और पीठ न करनी चाहिये।
संदर्भ : माताजी के वचन (भाग-१)
जीवनयात्रा में समस्त भय, संकट और विपदा का सामना करने के लिए कवच के रूप…
अपने तुच्छ, स्वार्थपूर्ण व्यक्तित्व से बाहर निकलो ओर अपनी भारतमाता के योग्य शिशु बनो ।…