तू जो कि सर्वव्याप्त है समस्त निचले लोकों में ,
फिर भी है विराजमान बहुत ऊपर ,
उन सबका स्वामी जो कार्य करते हैं शासक है और हैं ज्ञानी ,
प्रेम का अनुचर !
तू जो कि एक नन्हे कीट और मिट्टी के ढेले की भी
नहीं करता है अवहेलना ,
इसलिए इस विनम्रता के कारण हम जानते हैं
कि तू ही है परमात्मा ।
सन्दर्भ : श्रीअरविंद काव्य चयन
मैं तुम्हें अपना पुराना मन्त्र बताती हूं; यह बाह्य सत्ता को बहुत शान्त रखता है…
अगर अपात्रता का भाव तुम्हें उमड़ती हुई कृतज्ञता से भर देता है और आनन्दातिरेक के…
कभी मत बुड़बुड़ाओ । जब तुम बुड्बुड़ाते हो तो तुम्हारे अन्दर सब तरह की शक्तियां…