आध्यात्मिक भाव धार्मिक पूजाभाव, भक्ति और उत्सर्ग का विरोधी नहीं है। धर्म में ग़लती यह है कि मन एक ही सिद्धांत को ऐकान्तिक रूप से सत्य मान कर उससे ही चिपका रहता है। तुम्हें हमेशा याद रखना चाहिये कि सिद्धांत सत्य की केवल मानसिक अभिव्यक्ति हैं और यह भी कि यह सत्य हमेशा विभिन्न रूपों में प्रकट हो सकता है।
संदर्भ : माताजी के वचन (भाग-२)
उनके दुःख-दर्द से तीव्र रूप से पीड़ित होकर मैं तेरी ओर मुड़ी और उसका उपचार…
भागवत शक्ति को ग्रहण करने की क्षमता प्राप्त करने तथा तुम्हारे माध्यम से बाह्य जीवन…
यह कभी न भूलो कि तुम अकेले नहीं हो । भगवान् तुम्हारे साथ हैं, तुम्हारी…
जहाँ कहीं तुम एक महान अंत देखो, निश्चित हो जाओ कि एक महान आरंभ हो…
हमें यादों से इतना स्नेह होता है क्योंकि वे सार्वभौमिक हैं। उनके अन्दर 'अनन्तता' के…