आध्यात्मिक भाव धार्मिक पूजाभाव, भक्ति और उत्सर्ग का विरोधी नहीं है। धर्म में ग़लती यह है कि मन एक ही सिद्धांत को ऐकान्तिक रूप से सत्य मान कर उससे ही चिपका रहता है। तुम्हें हमेशा याद रखना चाहिये कि सिद्धांत सत्य की केवल मानसिक अभिव्यक्ति हैं और यह भी कि यह सत्य हमेशा विभिन्न रूपों में प्रकट हो सकता है।
संदर्भ : माताजी के वचन (भाग-२)
श्रीअरविन्द सूक्ष्म-भौतिक में निरन्तर रहते हैं और वहां बहुत सक्रिय हैं। मैं प्रायः रोज उनसे…
हे माँ , मैं आपकी उपस्थिति का अनुभव क्यों नहीं करता ? मानसिक गतिविधि की…
कोई संस्था प्रगतिशील हुए बिना जीवित नहीं रह सकती। सच्ची प्रगति है हमेशा भगवान् के…