आध्यात्मिक जीवन में जो चीज़ बाधक है वह शारीरिक सुख-सुविधाओं को महत्व देना और अपनी कामनाओं को आवश्यकता मान बैठना – दूसरे शब्दों में कहें तो अपने आप को धोखा देना ।
संदर्भ : श्रीमातृवाणी (खण्ड-१६)
एक या दो बार, बस खेल-ही-खेलमें आपने अपनी या श्रीअरविंदकी कोई पुस्तक ली और सहसा…
मेरे प्यारे बालक, तुम हमेशा मेरी भुजाओं में रहते हो और मैं तुम्हें सुख-सुविधा देने,…