इन मायावी वनों में एक देवशिशु खेल रहा है,
आत्मभाव की धाराओ के तट पर बंशी बजाता रसमाधुरी बहा रहा है,
कब उसकी पुकार की ओर मुड़ेंगे वह उस घड़ी की प्रतीक्षा में हैं ।
संदर्भ : सावित्री
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