इन मायावी वनों में एक देवशिशु खेल रहा है,

आत्मभाव की धाराओ के तट पर बंशी बजाता रसमाधुरी बहा रहा है,

कब उसकी पुकार की ओर मुड़ेंगे वह उस घड़ी की प्रतीक्षा में हैं ।

संदर्भ : सावित्री 

शेयर कीजिये

नए आलेख

न कुछ शुभ,न कुछ अशुभ

किसी भी ग़लत गति को भूमिगत की जगह उसे निवेदित कर देना चाहिये। उस चीज़…

% दिन पहले

पथ पर डटे रहो

तुम सभी, मेरे बच्चो, मैं तुमसे यह कह सकती हूँ, मैंने यह कई बार दोहराया…

% दिन पहले

योग के लिए आना

जीवन से और लोगों से घृणा और विरक्ति के कारण इस योग के लिए नहीं…

% दिन पहले

धर्मक्षेत्र

सारा जीवन ही धर्मक्षेत्र है, संसार भी धर्म है। केवल आध्यात्मिक ज्ञानलोचना और शक्ति की…

% दिन पहले

गर्व को त्यागने का तरीका

भगवान् के प्रति पूर्ण आत्मदान के लिए तीन विशेष विधियां : १. सारे गर्व को…

% दिन पहले

ज्ञान और बुद्धि

मधुर माँ,  ज्ञान और बुद्धि क्या हैं ? क्या हमारे जीवन में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका…

% दिन पहले