इन मायावी वनों में एक देवशिशु खेल रहा है,
आत्मभाव की धाराओ के तट पर बंशी बजाता रसमाधुरी बहा रहा है,
कब उसकी पुकार की ओर मुड़ेंगे वह उस घड़ी की प्रतीक्षा में हैं ।
संदर्भ : सावित्री
एक या दो बार, बस खेल-ही-खेलमें आपने अपनी या श्रीअरविंदकी कोई पुस्तक ली और सहसा…
मेरे प्यारे बालक, तुम हमेशा मेरी भुजाओं में रहते हो और मैं तुम्हें सुख-सुविधा देने,…