सर्वदा अनुभव करो और अपने बढ़ते हुए अनुभवों के प्रकाश में कार्य करो, पर केवल तर्क-वितर्क करने वाले मस्तिष्क के अनुभवों के प्रकाश में कार्य मत करो। ईश्वर हृदय से बातें करता है जब कि मस्तिष्क उसकी बात नहीं समझ सकता ।
संदर्भ : विचारमाला और सूत्रावली
तुम पानी में गिर पड़ते हो। वह विपुल जलराशि तुम्हें भयभीत नहीं करती। तुम हाथ-पांव…
अंदर की बेचैनी ही तुम्हें आंतरिक और बाह्य रूप से नींद लेने से रोकती है।…
तुम्हें डरना नहीं चाहिये। तुम्हारी अधिकतर कठिनाइयां भय से आती है। वास्तव में, ९० प्रतिशत…
श्रीअरविंद ने कितनी ही बार इस बात को दोहराया है कि परमात्मा हास्यप्रिय हैं और…