यह मैंने देख लिया है कि जो भगवान ने मुझे नहीं दिया है उसे उन्होने अपने प्रेम तथा ज्ञान के वश ही नहीं दिया है। यदि उस समय मैंने उसे पकड़ लिया होता तो मैंने किसी महान अमृत को एक महान विष में बदल दिया होता। फिर भी कभी कभी, जब हम हठ करते हैं तब, भगवान हमें विष पीने के लिये दे देते हैं जिसमें कि हम उससे मुंह मोड़ना सीख सकेंतथा ज्ञानपूर्वक उनके दिव्य भोग और अमृत रस का आस्वादन कर सकें ।
संदर्भ : विचारमाला और सूत्रावली
अंदर की बेचैनी ही तुम्हें आंतरिक और बाह्य रूप से नींद लेने से रोकती है।…
तुम्हें डरना नहीं चाहिये। तुम्हारी अधिकतर कठिनाइयां भय से आती है। वास्तव में, ९० प्रतिशत…
श्रीअरविंद ने कितनी ही बार इस बात को दोहराया है कि परमात्मा हास्यप्रिय हैं और…
अभीप्सा का तात्पर्य है, शक्तियों को पुकारना । जब शक्तियाँ प्रत्युत्तर दे देती हैं, तब…