समृद्धि
समृद्धि केवल उसी के साथ टिकी रह सकती है जो उसे भगवान को अर्पित करता है । संदर्भ : माताजी के वचन (भाग -२)
समृद्धि केवल उसी के साथ टिकी रह सकती है जो उसे भगवान को अर्पित करता है । संदर्भ : माताजी के वचन (भाग -२)
हमारा मूल्य अपने-आपका अतिक्रमण करने के प्रयास के परिमाण में है, और अपने-आपका अतिक्रमण करने का अर्थ है , भगवान को पाना । आखिर यह...
जब तुम अपने-आपको किसी नि:स्वार्थ कार्य की परिपूर्णता के लिये सौंप देते हो तो कभी सामान्य लोगों से प्रशंसा या सहायता की आशा न करो।...
सत्य ‘शक्ति’ हमेशा अचंचल होती है । दुर्बलता और अपूर्णता के निश्चित लक्षण हैं – बेचैनी, उत्तेजना तथा अधीरता। तुम्हें बाहरी परिस्थितियों में अचंचलता की...
प्रसन्नता भी उतनी ही संक्रामक है जितनी उदासी – इससे ज़्यादा उपयोगी और कुछ नहीं हो सकता कि तुम लोगों को सच्ची और गहरी प्रसन्नता...
भय गुप्त स्वीकृति है । जब तुम किसी चीज़ से डरते हो तो इसका या अर्थ है कि तुम उसकी सम्भावना को स्वीकार करते हो...
किसी अन्य मनुष्य के प्रभाव के प्रति खुले रहना हमेशा दुखद होता है। तुम्हें भगवान के सिवा और किसी के प्रभाव को अपने अन्दर न...
स्वाधीनता बाहरी परिस्थितियों से नहीं , आंतरिक मुक्ति से आती है । अपनी अंतरात्मा को खोजो, उसके साथ एक हो , उसें अपने जीवन पर...
तुम्हें अकेलापन इसलिये लगता है क्योंकि तुम्हें प्रेम की आवश्यकता मालूम होती है। बिना किसी मांग के प्रेम करना सीखो, केवल प्रेम के आनंद के...
तुम उस प्रेम से खुश नहीं होते जो कोई और तुम्हारे लिए अनुभव करता है। तुम्हें औरों के लिए जो प्रेम अनुभव होता है वह...