ऑरोदुनिया – पृष्ठ 76 – श्रीअरविंद और श्रीमाँ का संसार
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उपलब्धि का दरवाजा
… जिस क्षण तुम यह कल्पना करते और किसी-न-किसी तरह अनुभव करते हो, या , प्रारम्भ में, इतना मान भी लेते हो कि भगवान् तुम्हारें...
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प्रसन्नता
प्रसन्नता भी उतनी ही संक्रामक है जितनी उदासी – इससे ज़्यादा उपयोगी और कुछ नहीं हो सकता कि तुम लोगों को सच्ची और गहरी प्रसन्नता...
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केवल एक सहारा
भगवान के सिवा कभी किसी दूसरे मनुष्य या दूसरी वस्तु पर, वह चाहे जो हो निर्भर नहीं करना। कारण, यदि तुम किसी व्यक्ति का सहारा...
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मेरी आँखों में देखो
मेरे बच्चे, यदि तुम एकाग्र होकर गहराई से मेरी आँखों में देख सको तो तुम्हें वह सब मिल जायेगा जो तुम जानना चाहते हो, समझना...
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आध्यात्मिक जीवन की बाधा
आध्यात्मिक जीवन में जो चीज़ बाधक है वह शारीरिक सुख-सुविधाओं को महत्व देना और अपनी कामनाओं को आवश्यकता मान बैठना – दूसरे शब्दों में कहें...
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रोग का उद्देश्य
प्रत्येक रोग स्वस्थता के किसी नवीन आनंद की ओर जाने का एक पथ है, प्रत्येक अमंगल और दुख-ताप प्रकृति का किसी अधिक तीव्र आनंद और...
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सतत ‘उपस्थिती’
हमेशा ऐसे जियो मानों तुम ‘परम प्रभु’ तथा ‘भगवती माँ’ की दृष्टि के सामने हो। ऐसी कोई क्रिया न करो, ऐसी कोई चीज सोचने या...
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भय को स्वीकृति
भय गुप्त स्वीकृति है । जब तुम किसी चीज़ से डरते हो तो इसका या अर्थ है कि तुम उसकी सम्भावना को स्वीकार करते हो...
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बाहरी प्रभाव
किसी अन्य मनुष्य के प्रभाव के प्रति खुले रहना हमेशा दुखद होता है। तुम्हें भगवान के सिवा और किसी के प्रभाव को अपने अन्दर न...

























