सूर्यालोकित पथ का ऐसे लोग ही अनुसरण कर सकते हैं जिनमें समर्पण की साधना करने की क्षमता है, पहले तो केन्द्रीय समर्पण को तथा बाद में सत्ता के सभी भागों में अधिक पूर्ण आत्मदान की। यदि वे केन्द्रीय समर्पण की वृत्ति को प्राप्त कर सकें और सुरक्षित रख सकें, यदि वे भगवान पर पूरी तरह भरोसा रख सकें और भगवान् से आने वाली प्रत्येक वस्तु को प्रसन्नतापूर्वक स्वीकार कर सकें तो उनका मार्ग सूर्यालोकित हो जाता है और सीधा एवं सरल भी हो सकता है। वे लोग सब कठिनाइयों से बच नहीं जायेंगे; कोई भी साधक बच नहीं सकता, किन्तु बिना किसी कष्ट या निराशा के, जैसा कि निःसन्देह, गीता के परामर्शानुसार योग करना चाहिये अर्थात् “अनिविण्णचेतसा”,-आन्तरिक मार्गदर्शन पर विश्वास रखते हुए तथा इसका अधिकाधिक अनुभव करते हुए या गुरु के बाह्य पथ-प्रदर्शन में विश्वास करते हुए वे उनका सामना कर सकेंगे। इसका अनुसरण तब भी किया जा सकता है जब व्यक्ति को किसी प्रकाश या पथ-प्रदर्शन का अनुभव न हो, किन्तु यदि उसमें एक ज्वलन्त स्थिर श्रद्धा और प्रसादपूर्ण भक्ति हो या उसका स्वभाव आध्यात्मिक आशावादी का-सा हो और उसमें यह दृढ़ विश्वास या यह भाव हो कि भगवान् जो कुछ करते हैं वह तब भी अधिक-से-अधिक भले के लिए होता है जब हम उनकी क्रिया को नहीं समझ सकते। किन्तु सबका यह स्वभाव नहीं होता, अधिकतर लोग उससे बहुत दूर होते है और पूर्ण या केन्द्रित समर्पण भी प्राप्त करना सरल नहीं होता तथा इसे सदेव बनाये रखना हमारी मानव प्रकृति के लिए काफी कठिन है। इन चीजों के न होने पर आत्मा की मुक्ति उपलब्ध नहीं होती और इसके स्थान पर हमें नियम के अधीन रहना या कठोर और कठिन अनुशासन का पालन करना पड़ता है।

संदर्भ : श्रीअरविंद के पत्र 

 

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