यह सम्पूर्ण प्रकृति इक मूक भाव से
केवल मात्र उसी को पुकारती है,
कि तपकते पीड़ाकूल जीवन के व्रण
उसके चरण-स्पर्श से भर-भर जाएं,
औ’ धूमिल अंतरात्मा पर अंकित
मुहर बंदियां टूट-फूट झर जाएं,
औ’ द्रव्यों के पीड़ित पड़े हृदय में
उसका आलोक प्रज्वलित हो जाये।
सावित्री पर्व ३ सर्ग २
व्यापक दृष्टि से विचार करने पर मुझे ऐसा लगता है कि प्रचार करने योग्य सबसे…
तुम पानी में गिर पड़ते हो। वह विपुल जलराशि तुम्हें भयभीत नहीं करती। तुम हाथ-पांव…
अंदर की बेचैनी ही तुम्हें आंतरिक और बाह्य रूप से नींद लेने से रोकती है।…
तुम्हें डरना नहीं चाहिये। तुम्हारी अधिकतर कठिनाइयां भय से आती है। वास्तव में, ९० प्रतिशत…