समता के बिना साधना में दृढ़ आधार नहीं बन सकता। परिस्थितियाँ चाहे कितनी भी अप्रिय हों, दूसरों का व्यवहार चाहे कितना भी अरुचिकर हो, तुम्हें पूर्ण स्थिरता के साथ तथा किसी विक्षुब्धकारी प्रतिक्रिया के बिना उन्हें ग्रहण करना होगा। ये चीजें समता की कसौटी हैं। जब चीजें ठीक-ठाक हों तथा लोग और परिस्थितियाँ सुखद हों तब स्थिर-चित्त रहना आसान है। जब ये प्रतिकूल हों तब स्थिरता, शान्ति, समता की जाँच की जा सकती है, उन्हें सुदृढ़ तथा पूर्ण बनाया जा सकता है ।
संदर्भ : श्रीअरविंद के पत्र भाग – २
एक या दो बार, बस खेल-ही-खेलमें आपने अपनी या श्रीअरविंदकी कोई पुस्तक ली और सहसा…
मेरे प्यारे बालक, तुम हमेशा मेरी भुजाओं में रहते हो और मैं तुम्हें सुख-सुविधा देने,…