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सजीव और स्थायी शांति

यह पृथ्वी तब तक सजीव और स्थायी शांति का उपभोग नहीं कर सकतीं जब तक मनुष्य अपने अन्तर्राष्ट्रीय व्यवहारों में भी पूर्ण रूप से सत्यपरायण होना नहीं सीख लेते।

हे प्रभो! हम इसी पूर्ण सत्यपरायणता के लिए अभिप्सा करते हैं।

संदर्भ : माताजी के वचन (भाग-३)

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