तुम जितना पाते हो उससे संतुष्ट रहने की कोशिश करो-क्योंकि यह ग्रहणशीलता का मामला है-लोग जितना ग्रहण कर सकते हैं ,मैं उससे कहीं अधिक देती हूं- और दो-तीन मिनटों में वे इतना पा सकते हैं की वह महीने भर तक चले । लेकिन मन अपनी अज्ञानपूर्ण मांगों के द्वारा दखल देता है और सारी चीज बिगड़ जाती है ।
संदर्भ : माताजी के वचन (भाग-२)
भूल या सजा देने का कोई प्रश्न ही नहीं है-अगर लोगों को हम उनकी भूलों…
इन छोटी-छोटी बातों से क्यों उत्तेजित हो जाते हो? या उनसे अपने को क्यों विचलित…
जो श्रद्धा वैश्व भगवान के प्रति जाती है वह लीला की आवश्यकताओं के कारण अपनी…
भगवान मुझसे क्या चाहते है ? वे चाहते है कि पहले तुम अपने-आपको पा लो,…