तुम जितना पाते हो उससे संतुष्ट रहने की कोशिश करो-क्योंकि यह ग्रहणशीलता का मामला है-लोग जितना ग्रहण कर सकते हैं ,मैं उससे कहीं अधिक देती हूं- और दो-तीन मिनटों में वे इतना पा सकते हैं  की वह महीने भर तक चले । लेकिन मन अपनी अज्ञानपूर्ण मांगों के द्वारा दखल देता है और सारी चीज बिगड़ जाती है ।

संदर्भ : माताजी के वचन (भाग-२)

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