कुछ लोगो को श्रीमाँ के चारों और ज्योति आदि के दर्शन होते हैं पर मुझे नहीं होते । मेरे अंदर क्या रुकावट है ?
यह कोई रुकावट नहीं – यह केवल आंतरिक इंद्रियों के विकास का प्रश्न है । इसका आध्यात्मिक उन्नति के साथ कोई अनिवार्य संबंध नहीं । कुछ लोग पथ पर बहुत आगे बढ़ चुके हैं पर उन्हें इस प्रकार का अंतरदर्शन यदि होता भी है तो बहुत ही कम – दूसरी ओर, कभी-कभी निरे आरंभिक साधकों में, जिन्हें अभी केवल अत्यंत प्राथमिक आध्यात्मिक अनुभव ही हुए होते है, बहुत बड़ी मात्रा में विकसित हो जाता है ।
संदर्भ : माताजी के विषय में
श्रीमाँ की ओर खुले रहने का तात्पर्य है बराबर शांत-स्थिर और प्रसन्न बने रहना तथा…
आमतौर पर यह माना जाता है कि शिक्षा की प्रक्रिया में हल्की, मनोरञ्जक बल्कि तुच्छ…
विरोधी शक्तियों को संसार में इसीलिए सहा जाता है क्योंकि वे मनुष्य की सच्चाई की…
... उन दिनों क्या हुआ करता था जब छापेखाने नहीं थे, पुस्तकें नहीं थी और…
भगवान् के बाहर सब कुछ मिथ्या, भ्रान्ति और दुःखपूर्ण अंधकार है। भगवान् में हैं जीवन,…
भारत का मिशन या जीवन-लक्ष्य है मानवता को मानव-स्वातन्त्र्य, मानव-समानता, मानव-भ्रातृत्व के सच्चे उद्गम की…