श्रीअरविंद के देहत्याग के बाद श्रीमाँ ने उस कक्ष में से दर्शन देना बन्द कर दिया जिसमें वे श्रीअरविंद के साथ विराजमान होकर दर्शन देती थीं। वे उस कक्ष के दूसरे छोर पर एक कुर्सी पर विराजकर दर्शन देने लगीं। बाद में दर्शनार्थियों की संख्या इतनी बढ़ गई कि वे आश्रम के पूर्वी छज्जे से दर्शन देने लगीं।

भिवानी के प्रसिद्ध संत बाबा बेणीमाधव दास जब पांडिचेरी दर्शन के लिए आते थे उनके अनेक भक्त भी उनके साथ इस सुअवसर का लाभ उठाने आ जाते थे। एक दिन दर्शन का समय हो रहा था। बाबा उल्लास और अपेक्षा से भरे सड़क पर खड़े थे। श्रीमाँ  छज्जे पर पधारी। चारों और एक पवित्र निस्तब्धता छा गई। बाबा के दल की एक वृद्ध महिला ने, जो उनके समीप खड़ी थी, उनसे पूछा, “श्रीमाँ  के समीप खड़े वे वृद्ध व्यक्ति कौन हैं?” बाबा को श्रीमाँ के अतिरिक्त कोई दिखाई नहीं पड़ रहा था। महिला ने ज़ोर देकर कहा कि वहाँ धवल दाढ़ी और धवल केश वाले कोई व्यक्ति खड़े हैं। वह वृद्धा वस्तुतः भाग्यशाली थी कि उस दर्शन दिवस पर उसे खुली आँखों श्रीअरविंद के दर्शन हुए जब कि वे कई वर्ष पूर्व देहत्याग कर चुके थे ।

(यह कथा मुझे बाबा बेणीमाधव दास जी ने सुनाई थी ।)

संदर्भ : श्रीअरविंद और श्रीमाँ की दिव्य लीला 

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