श्रेणियाँ श्री माँ के वचन

श्रीअरविंद का शरीर त्याग

श्रीअरविंद ने अपना शरीर परम निस्वार्थता की क्रिया में त्यागा है। उन्होने अपने शरीर की उपलब्धियों को इसलिए त्यागा कि सामूहिक उपलब्धि का मुहूर्त आ सके । निश्चय ही अगर धरती अधिक ग्रहणशील होती, तो यह जरूरी न होता ।

संदर्भ : माताजी के वचन (भाग-१)

शेयर कीजिये

नए आलेख

सबसे महत्वपूर्ण चीज़

तुम्हें जो चीज़ जाननी चाहिये वह है, ठीक तरह से यह जानना कि तुम जीवन…

% दिन पहले

प्रभो, वर दे!

उनके दुःख-दर्द से तीव्र रूप से पीड़ित होकर मैं तेरी ओर मुड़ी और उसका उपचार…

% दिन पहले

तीन शर्तें

भागवत शक्ति को ग्रहण करने की क्षमता प्राप्त करने तथा तुम्हारे माध्यम से बाह्य जीवन…

% दिन पहले

भगवान तुम्हारे साथ हैं

यह कभी न भूलो कि तुम अकेले नहीं हो । भगवान् तुम्हारे साथ हैं, तुम्हारी…

% दिन पहले

चिंता

चिंता करना जहर का प्याला पीने के समान है । संदर्भ : पथ पर 

% दिन पहले

महान अंत ? या महान आरंभ?

जहाँ कहीं तुम एक महान अंत देखो, निश्चित हो जाओ कि एक महान आरंभ हो…

% दिन पहले