जब तक हम वर्तमान विश्व-चेतना में निवास करते हैं तब तक यह जगत, जैसा कि गीता ने कहा है, ‘अनित्यमसुखम’ है। उससे विमुख हो केवल भगवान की ओर मुड़ने और भागवत चेतना में निवास करने पर ही हम, जगत के द्वारा भी शाश्वत भगवान को प्राप्त कर सकते हैं।
संदर्भ : श्रीअरविंद के पत्र
भूल या सजा देने का कोई प्रश्न ही नहीं है-अगर लोगों को हम उनकी भूलों…
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