मैं तो सिर्फ उस सबको कार्यान्वित कर रही हूँ जिसे उन्होने ध्यानस्थ और हृदयस्थ किया ।
मैं तो मात्र मुख्य-क्रिया-केंद्र हूँ और उनके कार्य की निरंतरता का माध्यम हूँ ।
संदर्भ : श्रीमाँ का एजेंडा (भाग-१)
श्रीअरविन्द सूक्ष्म-भौतिक में निरन्तर रहते हैं और वहां बहुत सक्रिय हैं। मैं प्रायः रोज उनसे…
हे माँ , मैं आपकी उपस्थिति का अनुभव क्यों नहीं करता ? मानसिक गतिविधि की…
कोई संस्था प्रगतिशील हुए बिना जीवित नहीं रह सकती। सच्ची प्रगति है हमेशा भगवान् के…