इस परिपूर्ण शक्ति-चाप के अन्दर हमारा सीमित क्षेत्र निश्चित है
हमारे निरीक्षण और स्पर्श बोध की तथा विचार के अनुमान की सीमा है
और विरले क्षणों में परम-अज्ञेय का प्रकाश उदित हो उठता है
जो हमारे अन्तर में द्रष्टा और ऋषि को जगा देता है।
संदर्भ : “सावित्री”
तुम पानी में गिर पड़ते हो। वह विपुल जलराशि तुम्हें भयभीत नहीं करती। तुम हाथ-पांव…
अंदर की बेचैनी ही तुम्हें आंतरिक और बाह्य रूप से नींद लेने से रोकती है।…
तुम्हें डरना नहीं चाहिये। तुम्हारी अधिकतर कठिनाइयां भय से आती है। वास्तव में, ९० प्रतिशत…
श्रीअरविंद ने कितनी ही बार इस बात को दोहराया है कि परमात्मा हास्यप्रिय हैं और…