इस परिपूर्ण शक्ति-चाप के अन्दर हमारा सीमित क्षेत्र निश्चित है
हमारे निरीक्षण और स्पर्श बोध की तथा विचार के अनुमान की सीमा है
और विरले क्षणों में परम-अज्ञेय का प्रकाश उदित हो उठता है
जो हमारे अन्तर में द्रष्टा और ऋषि को जगा देता है।
संदर्भ : “सावित्री”
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