पहली शर्त है, अपने निजी हितों को लक्ष्य न बनाओ।
पहले गुण जिनकी जरूरत है वे हैं : बहादुरी, साहस और अध्यवसाय।
और फिर इस बारे में सचेतन होना कि तुम्हें जो जानना चाहिये उसकी तुलना में तुम कुछ भी नहीं जानते, तुम्हें जो करना चाहिये उसकी तुलना में तुम कुछ भी नहीं कर सकते, तुम्हें जो होना चाहिये उसकी तुलना में तुम कुछ भी नहीं हो।
तुम्हारी प्रकृति में जिस चीज की कमी है उसे प्राप्त करने के लिए, जो अभी तक तुम नहीं जानते उसे जानने के लिए, जो अभी तक तुम नहीं कर सकते उसे करने के लिए एक अपरिवर्तनशील संकल्प होना चाहिये।
निजी कामनाओं के अभाव से आने वाली ज्योति और शान्ति में तुम्हें सदा प्रगति करते रहना चाहिये।
तुम अपना कार्यक्रम बना सकते हो :
“हमेशा अधिक अच्छा और आगे ही आगे!”
और केवल एक ही लक्ष्य हो : भगवान को जानना ताकि उन्हें अभिव्यक्त कर सको।
दृढ़ बने रहो और तुम आज जो नहीं कर सकते उसे कल कर पाओगे।
संदर्भ : श्रीमातृवाणी (खण्ड-१६)
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