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यादों से स्नेह

हमें यादों से इतना स्नेह होता है क्योंकि वे सार्वभौमिक हैं। उनके अन्दर ‘अनन्तता’ के रस का कुछ अंश होता है। जिसे दैनिक घटनाओं में बाहरी, अहंकारपूर्ण और सीमित संवेदनशीलता के द्वारा देखा गया है-उस संवेदनशीलता द्वारा, जो कष्ट पाती और खुश होती है वह भ्रान्ति के बादलों की तरह ग़ायब हो जाता है। लेकिन उस अज्ञान-भरे बोध के पीछे-प्रायः उससे ढका हुआ—एक और बोध होता है, वास्तविक अन्तरात्मा का बोध जो सभी चीज़ों के द्वारा उनकी वैश्व अन्तरात्मा के साथ नाता जोड़ता है और सभी के अन्दर उसके पूर्ण आनन्द का अनुभव करता है।  ये बोध हमारी सत्ता की गहराइयों में यादों के रूप में बने रहते हैं और जब उनमें से कोई एक स्मृति में उभरता है तो वह भागवत परमानन्द का सुनहरा चोला पहन कर आता है। जिसे हम पहले अपने अज्ञानमय बोध में कष्ट और पीड़ा कहते थे वही सज-धज कर, रूपान्तरित और महिमान्वित होकर, भव्यता के उसी वेश से अलंकृत होकर फिर से आती है जिसे हम सुख और चैन कहते हैं। वास्तव में कभी-कभी पहली यादों की भव्यता, बाद की भव्यता से कहीं अधिक तीव्र और विशाल होती है। उनसे जो हर्ष मिलता है वह कहीं अधिक गहरा और शुद्ध होता है।

इस तरह, थोड़ा-थोड़ा करके हम चीज़ों की वास्तविकता और अपनी अन्धी इन्द्रियों की दी हुई झूठी व्याख्या में फ़र्क करना सीखते हैं। इसीलिए यादें ऐसी मूल्यवान् शिक्षिकाएँ होती हैं। इसीलिए यादें हमें इतनी प्रिय होती हैं। उनके द्वारा हम शाश्वत के सम्पर्क में आते हैं।

संदर्भ : पहले की बातें 

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