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महत्त्व केवल लक्ष्य का है

५३-धार्मिक सम्प्रदायों के झगड़े उन बर्तनों के आपसी विवाद के समान हैं जिनमें अमरता देने वाला अमृत भरा जायेगा। उन्हें झगड़ने दो किन्तु हमें तो अमृत लेने-पात्र कोई भी हो-और अमरत्व प्राप्त करने से मतलब है।

५४-तुम कहते हो कि बर्तन की सुगन्ध सुरा में आ जाती है। यह तो स्वाद है, किन्तु इसकी अमर कर देने वाली क्षमता इससे कौन छीन सकता है?

(श्रीअरविन्द, ‘विचार तथा सूत्र’)

 

अमरता का यह अमृत सर्वोच्च सत्य है, सर्वोच्च ज्ञान है, यह भगवान् के साथ ऐसा मिलन है जो अमरता की चेतना प्रदान करता है।

प्रत्येक सम्प्रदाय का भगवान् तक पहुंचने का अपना विशेष तरीका होता है और इसी अर्थ में श्रीअरविन्द इनकी तुलना विभिन्न पात्रों से करते  हैं। किन्तु वे कहते हैं : रास्ता कोई भी पकड़ो, इस बात का अधिक महत्त्व नहीं है। महत्त्व केवल लक्ष्य का है, और तुम किसी भी रास्ते पर चलो, लक्ष्य एक ही है। अमृत किसी भी पात्र में हो, होगा अमृत ही।

कछ लोग कहते हैं कि बर्तन का सौंधापन और जिस रास्ते का तुम अनुसरण करते हो वह रास्ता अमृत का स्वाद बदल देते हैं, दूसरे शब्दों में, वे भगवान् के साथ तुम्हारे मिलन को बदल देते हैं। श्रीअरविन्द उत्तर देते हैं : उन तक पहुंचने का रास्ता भिन्न हो सकता है और प्रत्येक व्यक्ति उसी रास्ते को चुनता है जो उसे पसन्द हो, तथा जो उसकी रुचि के सबसे अधिक अनुकूल हो, किन्तु स्वयं अमृत, अर्थात् भगवान् के साथ मिलन, समस्त अवस्थाओं में अमरत्व की अपनी शक्ति सरक्षित रखता है।

अब जब कि यह कहा जाता है कि भगवान् के साथ मिलन के द्वारा व्यक्ति अमरता की चेतना प्राप्त कर लेता है, तो इसका अर्थ यह है कि हमारी चेतना उस चेतना के साथ संयुक्त हो जाती है जो अमर है, परिणामस्वरूप वह अपने-आपको भी अमर अनुभव करती है। तब हम ही उन क्षेत्रों के प्रति सचेतन हो जाते हैं जहां अमरता का निवास है। किन्तु इसका यह अर्थ नहीं कि हमारी भौतिक सत्ता रूपान्तरित और अमर हो जाती है। इसके लिए एक बिलकुल दूसरी प्रणाली का अनुसरण करना होगा। और तुम्हें केवल इस चेतना को पहले प्राप्त ही नहीं करना होगा बल्कि उसे स्थूल जगत् में भी उतार लाना होगा। इसे केवल भौतिक चेतना का रूपान्तर ही नहीं बल्कि भौतिक सत्ता का भी रूपान्तर साधित करने देना होगा जो एक काफी बड़ा कार्य है।

संक्षेप में, तुम्हें वैयक्तिक उपलब्धि को समष्टि की उपलब्धि के साथ मिला नहीं देना चाहिये : जब हमें अमृत मिल गया है तो हम सब सम्प्रदायों से ऊपर उठ गये हैं, हमारे लिए इनका न कुछ अर्थ रह गया है और न उपयोग। किन्तु, सामान्य और सार्वजनिक रूप में, इनका मूल्य और उपयोग
मार्ग के रूप में तब तक बना रहेगा, जब तक मनुष्य सिद्धि प्राप्त नहीं कर लेते।

संदर्भ : विचार और सूत्र के संदर्भ में 

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