अधिक-से-अधिक सुंदर विचारों से भी हम प्रगति नहीं करते यदि हमारे अंदर उन्हें आधिकाधिक उदात्त भावों, उदात्त संवेदनाओं और अधिक यथार्थ क्रियाओं द्वारा प्रकट करने के लिए मनोबल न हो ।
संदर्भ : माताजी के वचन (भाग-२)
एक या दो बार, बस खेल-ही-खेलमें आपने अपनी या श्रीअरविंदकी कोई पुस्तक ली और सहसा…
मेरे प्यारे बालक, तुम हमेशा मेरी भुजाओं में रहते हो और मैं तुम्हें सुख-सुविधा देने,…