जब कोई प्रगति की जाती है तो वह प्रायः विरोधी शक्तियों को सक्रिय होनेके लिये उकसा देती है, वे शक्तियां उसके प्रभावों को शक्तिभर कम करना चाहती हैं। जब तुम्हें इस प्रकार का कोई निर्णायक अनुभव हो जाय तो तुम्हें अपनी शक्तियों को इधर-उधर बिखेर देने और चेतनाको किसी भी तरहसे बहिर्मुख बनाने से बचते हुए अपने अन्दर केन्द्रित रहना चाहिये और प्रगति को आत्मसात् कर लेना चाहिये।
सन्दर्भ : श्रीअरविन्द के पत्र (भाग-३)
उनके दुःख-दर्द से तीव्र रूप से पीड़ित होकर मैं तेरी ओर मुड़ी और उसका उपचार…
भागवत शक्ति को ग्रहण करने की क्षमता प्राप्त करने तथा तुम्हारे माध्यम से बाह्य जीवन…
यह कभी न भूलो कि तुम अकेले नहीं हो । भगवान् तुम्हारे साथ हैं, तुम्हारी…
जहाँ कहीं तुम एक महान अंत देखो, निश्चित हो जाओ कि एक महान आरंभ हो…
हमें यादों से इतना स्नेह होता है क्योंकि वे सार्वभौमिक हैं। उनके अन्दर 'अनन्तता' के…