तुम्हें बस शान्त-स्थिर और अपने पथ का अनुसरण करने में दृढ़ बनें रहना है और तुम अन्त तक पहुँच जाओगे। यदि तुम ऐसा करो तो परिस्थितियाँ अन्त में तुम्हारी इच्छा के अनुसार रूप ग्रहण करने को बाध्य होंगी, क्योंकि तब वह इच्छा तुम्हारे अंदर भगवान की इच्छा होगी ।
संदर्भ : श्रीअरविंद के पत्र
हे माँ , मैं आपकी उपस्थिति का अनुभव क्यों नहीं करता ? मानसिक गतिविधि की…
कोई संस्था प्रगतिशील हुए बिना जीवित नहीं रह सकती। सच्ची प्रगति है हमेशा भगवान् के…