तुम्हारी मानव-दृष्टि चीजों को एक सीधी लकीर में देखती है । तुम्हारे लिए या तो यह तरीका है या वह । मेरे लिए ऐसा नहीं है । मैं सारी वस्तु को चेतना के एक पिण्ड के रूप में देखती हूं जो अपने ध्येय या लक्ष्य की ओर बढ़ रही है । मुझे हर छोटी गति के लिए भी यह देखना पड़ता हैं कि सम्पूर्ण पिण्ड पर उसकी क्या प्रतिक्रिया होगी, बाद में क्या अप्रत्यक्ष प्रभाव आयेंगे ।
सन्दर्भ : माताजी के वचन (भाग-१)
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